"निष्काम कर्मयोगी"

सावन का ये सोमवार इत्तेफाकों भरा रहा।हमने खोया तो पूरा
दिन बहुत कुछ पर इंसानियत और असली धर्म का सबक भी याद
दिला गया।पूरा दिन खुद को मुसलमान कहने वाले नापाक पाक
आतंकियों ने फजीहत करे रखी सेना की,पुलिस की सरकार
कीऔर आम जनों की जिनमें रहे होंगे करोङों हिंदू और करोङों
मुसलमान भी,ईसाई भी,सिख भी और भी कई धर्मों को मानने
वाले लोग सारा दिन आतंक में थे ।और शाम तक इन नापाक धर्म
के दुश्मनों को मार गिराया गया।और ऑपरेशन सफल रहा।मगर
शाम को मिला एक और शोक समाचार जो पूरे देश को गमगीन
कर गया।नम हो गईं हर पलकें और हर मजहब के आँसू घुल रहे थे सावन
की बूँदों में।हर कोई अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहता था
इस महान विभूति को।
मौत उन नापाकों की भी हुई थी और इस"मुसलमान" की भी।
फर्क सिर्फ इतना था कि वो तीन फिदायीन आतंक और
हथियारों के ताबूतों में रुखसत थे और इधर एक सच्चा मुसलमान देह
त्याग रहा था और विदा ले रही थी वो दिव्य पुण्य आत्मा
जिसके एक हाथ में गीता तो दूजे में कुरान थी ,आध्यात्म की
नींवों में विज्ञान का कर्मयोग जारी था आखिरी श्वास
तक............

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