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Showing posts with the label प्रेम

नए सत्र का शुभ आरम्भ

सादर प्रणाम। एक बहुत लंबे अंतराल के बाद इस ब्लाग पर  फिर से आप सबका स्वागत है। आशा है इस नए सत्र में हम और सार्थक चिंतन कर सकें। ऐसा चिंतन जो आज के समय में चारों ओर व्याप्त ध्रुवीकरण से पूर्णतः मुक्त हो और किसी मत या विचार को अछूत न समझता हो; जो भीड़तंत्र को लोकतंत्र न समझता हो और जिसकी चेतना में हर एक की निजता और स्वतंत्रता के लिए सम्मान हो। तो इस दिशा में आरंभ करते हैं "समझ" को समझने का प्रयास करके। समझ के विषय में सबसे पहले तो यह समझें कि समझ तो केवल समझदार ही सकता है। नासमझ से तो ये हो न पाएगा। और समझदार के लिए इसके सिवा कोई विकल्प ही नहीं है। उसे तो समझना ही होगा। और कोई चारा नहीं है। यहाँ समझदार व्यक्ति सामर्थ्यवान होकर भी विवश है। क्योंकि समझना तो उसी को पड़ेगा। प्रेम में भी और शत्रुता में भी समझ के बिना तो गुजा़रा ही नहीं है। प्रेम में समझ का अभाव कलह को जन्म देता है। और शत्रुता में भी नासमझी घातक ही होती है। तो समझना तो पड़ेगा और समझदार को ही पड़ेगा । नासमझ नहीं समझेगा- गांठ बाँध लीजिए वह नहीं समझेगा। हठी नहीं है, बुरा नहीं है वह, बस नासमझ है। नासमझ से अनपढ़ भी न समझ...

SARAHAH के बहाने ......(व्यंग्य)

कल "Sarahah" को  uninstall कर ही दिया।झूठ काहे बोलें सात दिन में सिर्फ दो मैसेज आए। खुद को सांत्वना देने को सोचता हूँ शायद मेरे दोस्त इतने पारदर्शी हैं कि उन्हें मुझ से कुछ कहने को ऐसे माध्यमों की कोई आवश्यकता नहीं महसूस होती हो। पर अपने अनुभव से इतर देखूँ तो साराहा खूब चल रहा है।अपवादों को छोड़  दें तो लोग इस पर आने वाली हर अच्छी बुरी प्रतिक्रिया से संतुष्ट दिख रहे हैं।मनवांछित के लिए स्वीकार्यता और अनवांछित के लिए असहिष्णुता जो अन्य जगहों पर दिखती है वह यहां  नहीं  दिखाई  देती। इसकी लोकप्रियता  का सबसे बडा कारण है इसमें पहचानों की गोपनीयता।ये मनोविज्ञान की बात है कि हमें  वही वस्तुएं  अधिक लालायित करती हैं जो दिखाई नहीं देती।सुना है अमेरिका में एक स्टोर ने एक बार ऐसी हेयरपिन बेचनी शुरू की जो दिखती नहीं  थी।देखते ही देखते  ये खूब चलन में आ गईं।खूब  बिकने  लगीं।लोगों को यह अपील कर गईं।हर कोई  इसे खरीदने  लगा,सेल खूब  बढ गई ।बाद में पता चला कि असल में ऐसी कोई हेयरपिन थी ही नहीं डिबिया तो खाली थी। यह सही है कि ...

Let love remain special

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Since facebook came up with an option to give reactions and break the monotony of likes, I amended the way I used to like the pictures/posts. Earlier I used to like only those pictures/posts that seemed really special to me,now with the option to "love" them, I have been pretty generous to throw likes, as I've got the love one for the  loved ones. So basically the preciousness of a like has come to its all time low(atleast for me). This outdating of old things with the arrival of new ones is a more than acceptable norm in technology and related areas. And so we accepted this change and also mended our ways accordingly. With the option to love, like became a commonplace, it is left no more the same as it once used to be. I wonder what will be the next evolution? What if love too becomes commonplace? That will certainly not be a good sign, for love that is so special,must not be made so ordinary. Already we are living in times when the expression of love, if it is an art,...

ताजमहल !!!!!!

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आज के समाज में  प्रेम करने में बङी बंदिश है।बंदिश तो हमेशा ही थी,पर आज स्टेट स्पांसर्ड बदनामी है।सरकारें रोमियो को बदनाम कर रही हैं,तो बुद्धिजीवी कृष्ण को।तो भला प्रेम कौन करे? यदि रोमियो को पता होता कि सालों बाद उसके नाम से शोहदों का ज़िक्र आएगा तो कभी मुहब्ब्त करने की गुस्ताखी न करता।यदि  शाहजहाँ को पता होता कि उसके मरने के तीन सौ साल बाद ताजमहल को शिव मंदिर या किसी राजा का महल आदि बताया जाएगा तो प्यार की निशानी के रूप में इतनी बङी इमारत बनाने के फेर में न पङता।वैसे ताजमहल बनाने में आज के आशिक की कोई दिलचस्पी नहीं(और हैसियत भी नहीं)और ऐसा भी नहीं कि जहाँ ताज नहीं बने,वहाँ प्यार नहीं था।ताजमहल मुगल कालीन कलाकारी का एक अद्भुत् नमूना है,पर प्यार की एकमात्र निशानी नहीं। आज का प्रेमी ताजमहल क्यों नहीं बना रहा?इसके कई कारण हो सकते हैं।एक तो यह कि अब बादशाह रहे नहीं और उनकी बची-कुची बादशाहत भी इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स बंद कर के खत्म कर दी।धीरे-धीरे समाजवाद मजबूत होता चला गया और बादशाह होना एक महंगा सौदा हो गया ।इससे अच्छा है गरीब होना और सब्सिडी का हकदार बनना।पर क्यों न सरकार ...

"शाजि़या" (लघुकथा)

'अभी तक वही रिंगटोन,इनफैक्ट इफ़ आई ऐम नॉट रॉंग फोन भी वो ही है ना? यू आर इम्पौसिबल किशन।सात साल में बिलकुल नहीं बदले' शाज़िया ही बोले जा रही है,किशन बस हाँ या ना में सर हिला देता है । सात साल पहले भी शाज़िया ही ज़्यादा बोलती थी, ब्राह्मण का ये छोरा तो अक्सर खामोश ही रहता था। बातों का सिलसिला आगे बढने लगता है। सात साल बाद जो मिल रहे हैं दोनों। 'तो मैडम कैसे हैं आपके शौहर?' 'अच्छे हैं,ही इज़ वैरी केयरिंग।' एंड किड्स? 'आई हैव ए सन ।शाहिद नाम है।पाँच साल का हो गया है।' 'तुम बताओ तुम्हारी लाईफ कैसी चल रही है? How is your wife?' 'पता है शालिनी को भी म्यूज़िक का शौक है,और कविताएं भी लिखती है और लप्रेक भी।' 'मतलब तुम्हारी ही तरह हैं? 'ऐक्चुअली तुम्हारी तरह भी है,मुझे बोलने का मौका ही नहीं देती।' 'और तुम्हारी डॉटर? 'Yeah she is also very cute. Infact she is also like you, दो साल की है।' 'क्या नाम है?' थोङी देर खामोश रहा किशन। यह खामोशी मानों सात सालों के मौन की कहानी कह रही थ...