"अनजानी राह"

एक पतली सी पगडंडी  पर पथिक चलता जा रहा है।पथिक क्या चलता है,बस राह ही चलती है।वह तो पथिक है,उसका काम ही है चलना।राह भी सीधी है,तो उसका चलना तो सहज ही है ।चलना भी आगे की ही ओर है,पीछे मुङना मुनासिब नहीं। इसलिए पथिक चल रहा है आगे,कोई व्याकुलता नहीं,कोई विह्वलता नहीं,बस गतिशीलता ही दिखाई पङती है।

पर यह क्या? अचानक एक राह से दो राहें निकल पङीं। अब पथिक कुछ उलझन में है- किस ओर चले? दोनों ही राहें एक ही सी दिखती हैं- एक जैसा सन्नाटा है दोनों में,और ऐसा ही एक सन्नाटा पथिक के भीतर भी है- शून्यता का सन्नाटा। नहीं सूझता कहाँ जाए,कुछ पल सोचने लगा ही था कि उलझन और बढ गई-------कि अचानक तीसरी राह भी दिखने लगी।राह जिस पर चलकर पहुँचा था वह यहाँ तक,राह जिस पर उसकी सारी ऊर्जा का निचोङ था,राह जिसको वह अब छोङ आया था।
अब माथे की नस दुखने लगी,इक मायूसी सी छाने लगी और गतिशीलता पथिक की अब समाप्त हो चुकी है ।थम चुके हैं पथिक के कदम और अंतत: एक  "पथिक" जीवन समाप्त हो गया- क्योंकि संभवत: एक अनजानी राह पर चलने का भय था उसके मन में,या संदेहों के,अनिश्चितताओं के,शंकाओं के काले बादलों में किरण का अभाव था जो अनजानी राह पर पथिक के कदमों को आगे बढने न देता था।
नासमझ समझा नहीं कि इसी "अनजानी राह" पर था वह संगीत जो उसकी साँसों को गति देता था।

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