सुई या तलवार ?????

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि
जहां काम आवै सुई, कहा करै तलवारि।
रहीम का यह दोहा तो हमने सुना ही है,गौर करें बस सुई और तलवार पर।
प्रत्येक वस्तु का अपना मूल्य है।जो काम सुईं से हो सकता है,वह तलवार से संभव नहीं।पर अफसोस कि आज हम एक ऐसे दौर में हैं जब सुईं की कला सीखने का नहीं,तलवार की ताकत तोलने का प्रचलन है।जब से सोशल नेटवर्किंग साइट्स आई हैं,हमने देखा हैकि अब चीज़ें लोकप्रिय नहीं होतीं,प्रसिद्ध नहीं होती,बस "वाइरल" होती हैं।और ये वाइरल ही बङा घातक है,विष के प्याले के समान है।फेसबुक-व्हॉट्स एप आदि के माध्यम से जो एक सबसे बङा विषकारक वाइरल फैल रहा है इन दिनों-वह है राष्ट्रवाद।राष्ट्रवाद हो तो अच्छा है,पर यह है फर्जी राश्ट्रवाद (इस शब्द के जनक इस दौर में डॉ कुमार विश्वास हैं जहॉँ तक मेरी जानकारी है)। बङा व्यापक और भयावह है यह फर्जी राष्ट्रवाद।और इस को खाद-पानी से सींचता है सोशल मीडिया का अभिशाप।आए दिन हमारा(मेरा तो नहीं) खून उबाल देने वाले पोस्ट और मैसेजेज़ देखने को मिलते हैं।जैसे एक तस्वीर में तिरंगे को जलाता एक लङका दिख रहा है,और उस पर "माता-बहनों के सम्मान सूचक"शब्दों को चस्पा करते राष्ट्रवादियों का झुंड.....एक में खून से सनी हुई एक गाय.....और भी न जाने क्या-क्या "राष्ट्रवादी" पोस्ट।एक में तो मैंने देखा हमारी आज़ादी के नायक राष्ट्रपिता गांधी के विषय में ऐसी कीचङ उछालने वाली सूचनाएं जिन पर इतिहास शर्म से पानी-पानी हो जाए।इनमें से अधिकांश तो राजनीतिक लाभ के लिए होते हैं जैसा कि वर्तमान हालात में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से हो रहा है(और यूपी,गुजरात,उत्तराखण्ड और पंजाब के चुनावों तक चलेगा)परंतु सारा राष्ट्रवाद राजनीतिक आकाओं के द्वारा  स्पांसर्ड भी नहीं होता,कुछ "लिटिल नॉलेज" के मद में जोशीले नौजवानों की भोली-भाली राष्ट्रवादिता की सहज अभिव्यक्ति भी है------जैसे: पंद्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी पर तिरंगे वाली डीपी या ऐसी तिरंगे की फोटो जिसके नीचे लिखा हो-देश से प्यार करते हो तो कमेंट मे जय हिन्द लिखो।यहॉँ तक तो राष्ट्रवाद सही है,पर युवा पीढी महीन रेखा को बहुत जल्दी लांघ जाती है और फिर आते हैं पोस्ट जैसे-कमेंट में लिखो "पाकिस्तान मुर्दाबाद"।अरे भाई!!!हिंदुस्तान से वफादारी का सर्टिफिकेट पाकिस्तान मुर्दाबाद कहकर क्यों? दरअसल यह वह युवा पीढी हैजिसने सबसे कम किताबें पढी हैं और इसके पूरे(अधूरे) नॉलेज का स्त्रोत है सोशल मीडिया।यह पीढी गांधी से नफरत करती है और भगत सिंह इसके टेस्ट को अपील करता है (जबकि पढा इसने दोनों को नहीं है)।यह क्रांति और कुर्बानी की बङी-बङी बातें करती है फेसबुक और व्हॉट्स एप पर......यही इसकी कर्मभूमि है।
सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं,इस क्रम में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी आजकल राष्ट्रवाद के सर्टिफिकेट बांट रहा है,।और इतनी "साहसी एवम् निर्भीक" पत्रकारिता करता हे कि मैंने सुना है एक बहुत चिल्लाने वाले राष्ट्रभक्त न्यूज़ ऐंकर को पाकिस्तान से धमकी मिल रही है।मुझे तो हास्यास्पद लगता है एक न्यूज़ ऐंकर जिसको हमने स्टूडियो की चार-दीवारी में ही चिल्लाते देखा है,कभी सङक किनारे पान की दुकान पर भी इंटरव्यू करते नहीं देखा,उसकी आवाज़ कैसे "नेशन" की आवाज़ बन गई और कैसे अब उसकी जान को खतरा हो चला है।
सर्जिकल स्ट्राइक की तैयारी सेना की थी,परंतु उसके बाद से ही जो एक अलग किस्म का राष्ट्रवाद फेसबुक-व्हॉट्स ऐप-ट्विटर पर देखने को मिल रहा है वह बङा भयानक है।
चलिए जिधर से शुरू किए थे उसी सवाल पर आते हैं- सुईं या तलवार ? क्या थामना चाहेगी यह पीढी? समय की मांग हे कि बस एक बार यह चुनाव कर ले यह क्या थामना चाहे और फिर अपनी पूरी ऊर्जा उस मार्ग पर लगा दे।
बस सुईं और तलवार के बीच में चुनते समय इतिहास का इतना बोध रहे कि यह देश सूत काटकर और चरखा चलाकर आज़ाद हुआ है,हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर नहीं।

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