क्रिकेट में राष्ट्रवाद ??????

रहने दीजिए,ये असफल प्रयास मत कीजिए।क्रिकेट के दिए हुए आँसू हॉकी के आंचल से नहीं छुपने वाले।क्योंकि हॉकी का आंचल उतना बङा नहीं।हॉकी को हमने कभी प्रोजेक्टर लगा कर प्रोजेक्ट नहीं किया,हॉकी की जीत पर कभी सङकों पर जश्न नहीं मना,हॉकी की जीत के लिए कभी हवन नहीं हुए।जब हॉकी के लिए प्री-मैच विश्लेषण नहीं हुए,तो अब पोस्ट मैच चर्चा क्यों?
इसलिए खुद को झूठी सांत्वना न दी जाए और शोकाकुल हैं तो शोक ही प्रकट कीजिए अन्यथा दिल पर हाथ रखकर भारतीय हॉकी टीम के सभी खिलाङियों के नाम लेने की कोशिश कीजिए और अपनी इस झूठी सांत्वनाओं को प्रमाण पत्र दे दीजिए।
पर भारत की यही विशेषता है और यही हमारी प्रसन्नता का रहस्य है कि हम बङे बङे दु:खों को छोटी-छोटी खुशियों से भुलाने का प्रयास करते हैं।और होना भी ऐसा ही चाहिए।
पर यहाँ पर मुझे जो समझ में नहीं आता वह यह कि एक मैच हार जाने पर इतना दुख क्यों?मेरे कुछ मित्र तो कल रात से इस कदर सदमे में हैं जैसे परिवार में कोई बहुत खास भगवान को प्यारा हो गया हो।हर मैच की तरह कल भी वही हुआ कि एक बेहतर प्रदर्शन करने वाली टीम जीत गई तो फिर  यह संताप क्यों? क्योंकि हम उम्मीदें बहुत अधिक बांध देते हैं।मीडिया फिर अपनी  एक विशेष किस्म की शब्दावली से इन उम्मीदों का पोषण करता है।जैसे- 'विराट बाहुबली' ,भारत का सर्जिकल स्ट्राइक,आदि इत्यादि।मीडिया की तो दुकान ही ऐसी भाषा पर चल रही है,पर हाल के दिनों में अधिक दु:ख होता है वीरेंद्र सहवाग  जैसे पूर्व क्रिकेटर को जब मैं कहते हुए सुनता हूँ-'बाप बाप होता है,बेटा बेटा'।संभव है सामान्य बोल चाल में कोई खालिस दिल्ली या यूपी का "लौंडा" ऐसे शब्दों का प्रयोग करता हो,पर सूट-बूट पहन कर कमेंट्री बॉक्स में वीरू को मैं जब ऐसी भाषा का प्रयोग करते हुए देखता हूँ या उनके बेहूदा ट्वीट के बारे में सुनता हूँ,तो निराशा तो होती है पर बङा गर्व भी होता है कि हम हर्षा भोगले जैसे "ऑथेन्टिक स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टर" को सुनते हुए बङे हुए।अगली जेनरेशन का भविष्य पूरी तरह अंधकारमय दिखता है जब संगीत में उनके पास सिर्फ "ढिंचक पूजा" होगी और कॉमेंट्री में वीरेंद्र सहवाग।

इस भाषा के मूल में जो है,अब तनिक उस पर आया जाए- "राष्ट्रवाद"।'भारत सब से हार जाए पर पाकिस्तान से नहीं हारना चाहिए' यही वह राष्ट्रवाद है जो हमें खेल को खेल की तरह देखने नहीं देता।खेल में राष्ट्रवाद की घुसपैठ हमें कभी अच्छे की प्रशंसा और बुरे की आलोचना पूरी ईमानदारी से करने नहीं देगी।मैं क्रिकेट का बहुत बङा प्रशंसक हूँ और जब भी कोई मैच देखता हूँ,राष्ट्रवाद या देशभक्ति को कभी क्रिकेट पर हावी नहीं होने देता।इसीलिए रोमांचित होता हूँ  मोहम्मद आमिर की नई गेंद से घातक गेंदबाज़ी देखकर,युवा फख़र ज़मान की आत्मविश्वास से भरी हुई  ताबङतोङ बल्लेबाज़ी देखकर और हार्दिक पंड्या के दर्शनीय लंबे-लंबे छक्के देखकर।और इतना ही रोमांचित होता हूँ इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की एशेज़ वाली प्रतिस्पर्धा देखकर भी।पर राष्ट्रवाद के चश्मों से देखेंगे तो खेल को खेल की नजर से देख ही नहीं पाएंगे।
मज़े की बात तो ये है कि ये राष्ट्रवाद भी बङा दोगुला किस्म का है।राष्ट्रवाद के नाम पर एक गरीब आदमी को कहते हो चीन की सस्ती लङियाँ मत खरीदो,और करोङपति बोर्ड के करोङपति खिलाङी चीन की कंपनी के स्पॉंसर वाली जर्सी पहन कर हमारे राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।उद्योग जगत के लोग राष्ट्रवाद के नाम पर कभी अपने मुनाफे से समझौता नहीं करते,पर इस देश के गरीब को राष्ट्रवाद पर व्याख्यान दिये जाते हैं।राष्ट्रूवाद के नाम पर गेरुआ पहनने वाला एक संन्यासी बाबा दस हजार करोङ के टर्न ओवर तक पहुँच जाता है और यही  राष्ट्रवाद एक बीएसएफ के जवान को खराब खाने की बात सामने रखने का अधिकार नहीं देता,एक शहीद की बेटी को युद्ध के खिलाफ बोलने का अधिकार नहीं देता।

इसलिए फ्री मार्केट के सभी लाभों को लीजिए,सबसे उत्तम खाइए,पहनिए,पढिए और देखिए।न सिर्फ देश से बल्कि पूरे विश्व से प्रेम कीजिए।और अगली बार हुकूमत या कोई बाबा राष्ट्रवाद पर प्रवचन दे तो भावनाओं में बहने से पहले उस राष्ट्रवाद की गहराई को भी नाप लीजिएगा।

Comments