"भीड़" से इतर ...

मद्रास हाईकोर्ट ने कोरोना के बढ़ते मामलों के लिए बहुत कड़े शब्दों में चुनाव आयोग की आलोचना की है। आलोचना भी हलका शब्द है। हत्यारा करार दिया है चुनाव आयोग के अधिकारियों को। वैसे बात सही भी है। जब Accountability फिक्स करनी ही हो (और करनी ही चाहिए) तो सबसे पहले बात चुनावी रैलियों की ही होनी चाहिए। क्योंकि "दो गज की दूरी" के नियम का सबसे अधिक बेशर्मी के साथ उल्लंघन तो यहीं हो रहा था। बल्कि अब उल्लंघन हलका शब्द मालूम पड़ता है। धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं। तो मद्रास हाईकोर्ट की बात तो एकदम ठीक है पर ये टिप्पणी अधूरी है। क्योंकि पहली लहर और दूसरी लहर के बीच के समय को अब याद कीजिए तो पाएंगे कि चुनावी रैलियों से इतर भी देश में कई जगह भीड़ थी। कुंभ में दूरी के नियम की अनदेखी हुई और किसान आंदोलन में भी। और इन सबसे पहले सुशांत को इंसाफ दिलाने के नाम पर जो मीडिया ट्रायल इस देश ने देखा वह सबसे त्रासदीपूर्ण था। कोरोना के प्रसार के बीच भी मीडिया जिस लापरवाही के साथ भीड़ पैदा कर रहा था, वह इस TRP वाली रिपोर्टिंग का सबसे घटिया चेहरा था। याद कीजिए रिया चक्रवर्ती का पीछा करती मीडिया की गाड़ियों का काफिला। उस दौर में मीडिया ने न्याय दिलाने के नाम पर जो तमाशा किया था, उसमें दूरी का नियम पूरी तरह नदारद था। वह भीड़ भी राजनीतिक सत्ता के समर्थन से पैदा हो रही थी, सत्ता को भोगने के लिए ही पैदा हो रही थी। उस समय बिहार में चुनाव थे। अब बंगाल और अन्य राज्यों में। वो साल 2020 था ये साल 2021 है। वह भी लोकतंत्र का पर्व था यह भी लोकतंत्र का पर्व। लोकतंत्र भीड़ पर जीता है। भीड़ को वह पैदा करता है और फिर भीड़ ही उसका पोषण करती है। भीड़ ही राजनीतिक सत्ता को शक्तिशाली बनाती है और भीड़ ही सत्ता की ढाल बनती है।  भीड़ ही सत्ता की नींव में है और भीड़ ही अट्टालिकाओं के स्तंभों में भी। भीड़ केवल लोकतंत्र के पर्व के नाम पर ही नंगा नाच नहीं करती, भीड़ का तो स्वभाव ही उन्माद का है। भीड़ में हर व्यक्ति का विवेक शून्य हो जाता है और भीड़ का सामूहिक चरित्र हावी। भीड़ का हिस्सा हो कर इनसान ने आज तक जितनी हिंसा की है, जितनी नफरत फैलाई है, जितना विष घोला है दुनिया में, जितने युद्ध लडे हैं, कोई अकेला व्यक्ति भीड़ से इतर कभी नहीं कर सकता था। क्योंकि अकेले व्यक्ति के अंदर, चाहे वह कितना भी क्रूर क्यों न हो, संवेदना, विवेक, चेतना पैदा होने की संभावना रहती ही है, पर भीड़ में ये सब गर्भ में ही मर जाते हैं और बचती है बस एक भीड़। 

 
तो देश में कोरोना के इस भयानक रूप के लिए भी किसी को जिम्मेदार ठहराना ही हो तो भीड़ को ही ठहराना चाहिए। पर ये आसान नहीं है। भीड़ पर Accountability फिक्स नहीं की जा सकती। भीड़ को पहचानना भी संभव नहीं, भीड़ का चेहरा ही स्पष्ट नहीं है। भीड़ तो मुखौटों पर ही जीती है। जब कोरोना नहीं था और जब कोरोना नहीं होगा तब भी भीड़ हमेशा मास्क लगाए रखती है। इसलिए भीड़ बच निकलती है। Mob Lynching कर के भाग जाती है भीड़। अफवाह फैला कर भाग जाती है भीड़। ध्रुवीकरण की आग लगा कर बच जाती है भीड़। इस आग में व्यक्ति मरते रहते हैं, पर भीड़ बढ़ती रहती है। भीड़ का स्वभाव Multiply करने का भी है। इसका विरोध करती हुई आवाज़ एक नई भीड़ पैदा करती है। ऐसे बनते चले जाते हैं समूह। राष्ट्र भी ऐसे ही बने हैं, आगे भी ऐसे ही बनेंगे। इन राष्ट्रों में, इन समूहों में बस भीड़ ही होती है, व्यक्ति सारे मरते रहते हैं। जितने ज्यादा व्यक्ति मरते जाएंगे, उतनी ही बड़ी भीड़ होती जाएगी। इसलिए दो-चार लाख व्यक्तियों के मर जाने से सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ता । क्योंकि राजनीतिक सत्ता व्यक्तियों पर नहीं, भीड़ पर जीती है। यहाँ यह न समझा जाए कि लोकतंत्र ही ऐसी भीड़ को जन्म देता है। यही बुरी व्यवस्था है। दरअसल लोकतंत्र तो सबसे खूबसूरत व्यवस्था है (शायद सबसे कम बदसूरत कहना चाहिए)। अन्य व्यवस्थाओं में भीड़ और भी खतरनाक होती है। लोकतंत्र बेहतर इसलिए भी है कि इतने सारे समूह, इतनी भीड़ के बीच भी इसमें एक छोटी सी खिड़की हमेशा खुली होती है Individual के पैदा होने के लिए, भीड़ से इतर एक व्यक्ति के, एक विचार के पैदा होने के लिए। आक्सीजन के संकट के समय में यह समझना मुश्किल होगा फिर भी कहता हूँ विचारों के तल पर भी आक्सीजन और वेंटीलेशन बहुत जरूरी है- भीड़ से इतर व्यक्ति के जिंदा रहने के लिए। फिर से कहूंगा बहुत कम लिखा है बहुत अधिक समझा जाना चाहिए। इस ब्लाग की कल्पना में ही है एक ऐसा लोकतंत्र जो स्वतंत्रता को बढावा देता हो,भीड़ को नहीं। 
अपना खयाल रखिए, सुरक्षित रहिए, मास्क पहनिए पर साथ ही नए विचारों की खुली हवा को भी आने दीजिये। ये जरूरी है जिंदा रहने के लिए...

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