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Pakistan: Where Faith Excuses Failure

Hosting an ICC event after 29 years, only to be the first team knocked out. No century on their own highways, played more than 300 dots in two games, yet there are praises coming from his mates, for the skipper's "Namaz". Whether on the field or in politics, wrap failure in faith and you don't just escape accountability, you become the "messiah". That's Pakistan for you! #Sorry_State

भारत vs India ?

वन नेशन वन इलेक्शन एक बहुत अच्छा प्रहार होगा ऐसे लोगों पर जो फुल टाइम केवल राजनीति करते हैं। ये लोग और कुछ नहीं करते, केवल राजनीति करते हैं। ऐसे लोग बेहद घातक होते हैं एक स्वस्थ समाज में क्यों कि अपनी "फुल टाइम वाली राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं" के पोषण के लिए समाज में विष घोलते रहने के सिवा इनके पास कोई विकल्प नहीं होता। फुल टाइम राजनीति करनी है तो विष तो घोलना ही होगा, नफरत तो पैदा करनी ही होगी। समाज को बांटना तो होगा ही। जब धर्म, संप्रदाय, जाति, आदि की सब दीवारें cliche लगने लगें, तब राजनीति गढ़ती है कुछ नया, मसलन भारत और इंडिया के बीच भी दीवार ये खड़ी कर देती है, क्या अंतर है भारत और इंडिया में, इसके मायने कई हैं, इसके तर्क भी राजनीति कई खोज लेगी, कुतर्क उससे भी ज़्यादा, पर इन सब की ज़रूरत नहीं, बस इतना ही काफी है कि राजनीति ने एक दीवार खड़ी कर दी है, राजनीति इन्हीं दीवारों पर मज़बूत खड़ी रहती है। वो ही दीवारें जो समाज को बांट रही होती हैं, ज़मीन तैयार कर रही होती हैं राजनीति के लिए। फुल टाइम राजनीति में हर दिन बिना कुछ अच्छा किए भी आपको हर दिन प्रासंगिक बने रहने की चुनौती है...

"भीड़" से इतर ...

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मद्रास हाईकोर्ट ने कोरोना के बढ़ते मामलों के लिए बहुत कड़े शब्दों में चुनाव आयोग की आलोचना की है। आलोचना भी हलका शब्द है। हत्यारा करार दिया है चुनाव आयोग के अधिकारियों को। वैसे बात सही भी है। जब Accountability फिक्स करनी ही हो (और करनी ही चाहिए) तो सबसे पहले बात चुनावी रैलियों की ही होनी चाहिए। क्योंकि "दो गज की दूरी" के नियम का सबसे अधिक बेशर्मी के साथ उल्लंघन तो यहीं हो रहा था। बल्कि अब उल्लंघन हलका शब्द मालूम पड़ता है। धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं। तो मद्रास हाईकोर्ट की बात तो एकदम ठीक है पर ये टिप्पणी अधूरी है। क्योंकि पहली लहर और दूसरी लहर के बीच के समय को अब याद कीजिए तो पाएंगे कि चुनावी रैलियों से इतर भी देश में कई जगह भीड़ थी। कुंभ में दूरी के नियम की अनदेखी हुई और किसान आंदोलन में भी। और इन सबसे पहले सुशांत को इंसाफ दिलाने के नाम पर जो मीडिया ट्रायल इस देश ने देखा वह सबसे त्रासदीपूर्ण था। कोरोना के प्रसार के बीच भी मीडिया जिस लापरवाही के साथ भीड़ पैदा कर रहा था, वह इस TRP वाली रिपोर्टिंग का सबसे घटिया चेहरा था। याद कीजिए रिया चक्रवर्ती का पीछा करती मीडिया की गाड़ियों का...

Bertrand Russell's Ten Commandments of Critical Thinking

As a part of our series of foundational posts on critical thinking, today I am sharing with you the very popular ten commandments of critical thinking given by Bertrand Russell in an article published in a 1951 edition of the New York Times Magazine :- 1) Do not feel absolutely certain of anything. 2) Do not think it worthwhile to proceed by concealing evidence, for the evidence is sure to come to light. 3) Never try to discourage thinking, for you are sure to succeed. 4) When you meet with opposition, even if it should be from your husband or your children, endeavour to overcome it by argument and not by authority, for a victory dependent upon authority is unreal and illusory. 5) Have no respect for the authority of others, for there are always contrary authorities to be found. 6) Do not use power to suppress opinions you think pernicious, for if you do the opinions will suppress you. 7) Do not fear to be eccentric in opinion, for every opinion now accepted was once eccentric. 8) Find...

नए सत्र का शुभ आरम्भ

सादर प्रणाम। एक बहुत लंबे अंतराल के बाद इस ब्लाग पर  फिर से आप सबका स्वागत है। आशा है इस नए सत्र में हम और सार्थक चिंतन कर सकें। ऐसा चिंतन जो आज के समय में चारों ओर व्याप्त ध्रुवीकरण से पूर्णतः मुक्त हो और किसी मत या विचार को अछूत न समझता हो; जो भीड़तंत्र को लोकतंत्र न समझता हो और जिसकी चेतना में हर एक की निजता और स्वतंत्रता के लिए सम्मान हो। तो इस दिशा में आरंभ करते हैं "समझ" को समझने का प्रयास करके। समझ के विषय में सबसे पहले तो यह समझें कि समझ तो केवल समझदार ही सकता है। नासमझ से तो ये हो न पाएगा। और समझदार के लिए इसके सिवा कोई विकल्प ही नहीं है। उसे तो समझना ही होगा। और कोई चारा नहीं है। यहाँ समझदार व्यक्ति सामर्थ्यवान होकर भी विवश है। क्योंकि समझना तो उसी को पड़ेगा। प्रेम में भी और शत्रुता में भी समझ के बिना तो गुजा़रा ही नहीं है। प्रेम में समझ का अभाव कलह को जन्म देता है। और शत्रुता में भी नासमझी घातक ही होती है। तो समझना तो पड़ेगा और समझदार को ही पड़ेगा । नासमझ नहीं समझेगा- गांठ बाँध लीजिए वह नहीं समझेगा। हठी नहीं है, बुरा नहीं है वह, बस नासमझ है। नासमझ से अनपढ़ भी न समझ...

पद्मावत के बहाने.......🤔🤔

इस बार गणतंत्र दिवस से ज्यादा चौकसी पद्मावत् को लेकर दिख रही है ।राष्ट्रपति भवन में २६ जनवरी की स्वाभाविक हलचल दिखाई देती है तो हलचल देश भर के सिनेमाघरों में भी है।और ये हलचल चित्तौरगढ से ८०० किमी दूर यहाँ देहरादून में भी महसूस की जा सकती है । करनी सेना के इस विरोध का पैन इंडिया इतना मुखर होना या ऐसी संभावना भी मुझे हास्यास्पद लगती है और इसके कुछ कारण हैं ।सबसे पहले तो हमारा इतिहास बोध बहुत ही कमजोर है।इसका एक उदाहरण देखने को मिला पिछले साल 14 फरवरी पर जब न जाने कितने ही लोगों ने सोशल मीडिया पर Valentine's Day का विरोध इस तर्क के साथ किया कि इस दिन भगत सिंह,राजगुरू और सुखदेव को फांसी दी गई  थी।पूरे दिन इस तरह की तमाम पोस्ट मैंने फेसबुक पर देखी।यही नहीं इनको लाइक एवम् शेयर करने वाले "राष्ट्वादी चेतना से जागृत" लोगों में अधिकतर पढे लिखे और यहाँ तक कि कुछ तो इतिहास के प्रोफेसर भी थे।अब जब इतिहास बोध की यह स्थिति है देश में तब पद्मावत पर  देशभर में हंगामा मुझे न सिर्फ हास्यास्पद लगता है बल्कि सुनियोजित भी।भंसाली को अपनी फिल्म के लिए इससे अच्छी पब्लिसिटी नहीं मिल सकती थी।करनी...

SARAHAH के बहाने ......(व्यंग्य)

कल "Sarahah" को  uninstall कर ही दिया।झूठ काहे बोलें सात दिन में सिर्फ दो मैसेज आए। खुद को सांत्वना देने को सोचता हूँ शायद मेरे दोस्त इतने पारदर्शी हैं कि उन्हें मुझ से कुछ कहने को ऐसे माध्यमों की कोई आवश्यकता नहीं महसूस होती हो। पर अपने अनुभव से इतर देखूँ तो साराहा खूब चल रहा है।अपवादों को छोड़  दें तो लोग इस पर आने वाली हर अच्छी बुरी प्रतिक्रिया से संतुष्ट दिख रहे हैं।मनवांछित के लिए स्वीकार्यता और अनवांछित के लिए असहिष्णुता जो अन्य जगहों पर दिखती है वह यहां  नहीं  दिखाई  देती। इसकी लोकप्रियता  का सबसे बडा कारण है इसमें पहचानों की गोपनीयता।ये मनोविज्ञान की बात है कि हमें  वही वस्तुएं  अधिक लालायित करती हैं जो दिखाई नहीं देती।सुना है अमेरिका में एक स्टोर ने एक बार ऐसी हेयरपिन बेचनी शुरू की जो दिखती नहीं  थी।देखते ही देखते  ये खूब चलन में आ गईं।खूब  बिकने  लगीं।लोगों को यह अपील कर गईं।हर कोई  इसे खरीदने  लगा,सेल खूब  बढ गई ।बाद में पता चला कि असल में ऐसी कोई हेयरपिन थी ही नहीं डिबिया तो खाली थी। यह सही है कि ...

Let love remain special

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Since facebook came up with an option to give reactions and break the monotony of likes, I amended the way I used to like the pictures/posts. Earlier I used to like only those pictures/posts that seemed really special to me,now with the option to "love" them, I have been pretty generous to throw likes, as I've got the love one for the  loved ones. So basically the preciousness of a like has come to its all time low(atleast for me). This outdating of old things with the arrival of new ones is a more than acceptable norm in technology and related areas. And so we accepted this change and also mended our ways accordingly. With the option to love, like became a commonplace, it is left no more the same as it once used to be. I wonder what will be the next evolution? What if love too becomes commonplace? That will certainly not be a good sign, for love that is so special,must not be made so ordinary. Already we are living in times when the expression of love, if it is an art,...

क्रिकेट में राष्ट्रवाद ??????

रहने दीजिए,ये असफल प्रयास मत कीजिए।क्रिकेट के दिए हुए आँसू हॉकी के आंचल से नहीं छुपने वाले।क्योंकि हॉकी का आंचल उतना बङा नहीं।हॉकी को हमने कभी प्रोजेक्टर लगा कर प्रोजेक्ट नहीं किया,हॉकी की जीत पर कभी सङकों पर जश्न नहीं मना,हॉकी की जीत के लिए कभी हवन नहीं हुए।जब हॉकी के लिए प्री-मैच विश्लेषण नहीं हुए,तो अब पोस्ट मैच चर्चा क्यों? इसलिए खुद को झूठी सांत्वना न दी जाए और शोकाकुल हैं तो शोक ही प्रकट कीजिए अन्यथा दिल पर हाथ रखकर भारतीय हॉकी टीम के सभी खिलाङियों के नाम लेने की कोशिश कीजिए और अपनी इस झूठी सांत्वनाओं को प्रमाण पत्र दे दीजिए। पर भारत की यही विशेषता है और यही हमारी प्रसन्नता का रहस्य है कि हम बङे बङे दु:खों को छोटी-छोटी खुशियों से भुलाने का प्रयास करते हैं।और होना भी ऐसा ही चाहिए। पर यहाँ पर मुझे जो समझ में नहीं आता वह यह कि एक मैच हार जाने पर इतना दुख क्यों?मेरे कुछ मित्र तो कल रात से इस कदर सदमे में हैं जैसे परिवार में कोई बहुत खास भगवान को प्यारा हो गया हो।हर मैच की तरह कल भी वही हुआ कि एक बेहतर प्रदर्शन करने वाली टीम जीत गई तो फिर  यह संताप क्यों? क्योंकि हम उम्मीदें ब...

Being Textrovert.......

Language is dynamic and flexible. On an average 2000 new words are added every year to the Oxford English dictionary. After much success of the words "introvert"and "extrovert", there is a somewhat similar new word in the domains of lexicography-"TEXTROVERT". Though the word has not yet been added in the Oxford or Webster Dictionary, it has caught the attention of many like me. I feel myself very close to this word. This word can act as an adjective for me,provided, if only, I am allowed to define it in the best of my proximity. Generally,the word "Textrovert" can be used to describe someone who's far more comfortable texting/writing than being in person,or talking over a phone, and I am exactly the same. Now,let me throw some more light on this type of characters to justify them lest you feel they are abnormal or absurd.Firstly, textrovert is poles apart from being introvert. It is common sense if these two meant same, what was the need o...

हम फिल्में क्यों देखते हैं ?

मैंने बाहुबली वन नहीं देखी थी और अगर कुछ चमत्कारिक नहीं घटा,तो स्वाभाविक है कि बाहुबली 2 भी नहीं देखूंगा। बात फिल्म समीक्षा की नहीं, स्वभाव की है। फिल्म देखना मुझे बहुत रास नहीं आता। ऐसा भी नहीं है कि कोई ऐलर्जी हो फिल्मों से-कभी टीवी देखते हुए रिमोट और आँखें सहज ही किसी खास फिल्म पर आ कर रुक जाएं तो देख भी लेता हूँ। पर खुद से  पहल नहीं करता। बस! इतना ही संबंध है मेरा फिल्मों से।और फिल्म न देखने के लिए कोई तर्क गढने में भी मेरी कभी दिलचस्पी नहीं रहती, जैसे दिवाली पर पटाखे न फोङने पर ईकोफ्रेंडली का राग या चीनी सामान न खरीदने के पीछे का राष्ट्रवाद या शाहरुख या आमिर ने कोई तथाकथित विवादित बयान दे दिया, तो इस स्टार की फिल्म बॉयकॉट कर दी जाए,ये सब अस्थायी जज़्बात हो सकते हैं, दीर्घकालिक और तार्किक नहीं। ये प्रश्न भी मुझे विचलित नहीं करता कि जिस देश को स्नैपचैट का सीईओ गरीब कहता है, वही देश अमूमन हर माह एक न एक फिल्म को सौ या दो सौ या तीन सौ करोङ क्लब में शामिल कैसे कर रहा है। यह प्रश्न भी विचलित नहीं करता कि जब किसी फिल्म के पीछे ऐसी दीवानगी हो तो यह मुझे आकर्षित क्यों नहीं कर रही? वह क...

लघुकथा : "रिश्ते"

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'चालीस साल हो गए और तुमने इस खत को अब तक संभाले रखा है  मनोहर?' 'हाँ कैसे ना रखूँ? अपनी पैंतीस साल की पोस्टमास्टर की नौकरी में हर एक खुशी और गम का पैगाम गंतव्य तक पहुँचाया है।यही तो एक अवसर था जब मैंने अपने काम को पूरा नहीं किया।और यही अधूरा काम मुझे मेरी पूर्णता का ऐहसास कराता हे।जरा सोचो उस दिन तुम्हारे पिता का लिखा ये खत तुम तक पहुँचा दिया होता तो जा चुकी होती तुम//किसी और से शादी//फिर कहाँ होता मेरा तुम्हारा ये साथ।और साथ भी कितना सुंदर,कितना हसीन।मिताली के बिना मनोहर अधूरा और मनोहर के बिना मिताली.....दोनों एक दूजे के पूरक।आजकल के ज़माने में ऐसे रिश्ते कहाँ संभव हैं मिताली?' 'व्हॉट्सैप वाले ज़माने में खत छुपा कर खबर छिपा लेना भी कहाँ संभव है मनोहर?' और दोनों खिलखिला कर हँस दिए..........

ताजमहल !!!!!!

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आज के समाज में  प्रेम करने में बङी बंदिश है।बंदिश तो हमेशा ही थी,पर आज स्टेट स्पांसर्ड बदनामी है।सरकारें रोमियो को बदनाम कर रही हैं,तो बुद्धिजीवी कृष्ण को।तो भला प्रेम कौन करे? यदि रोमियो को पता होता कि सालों बाद उसके नाम से शोहदों का ज़िक्र आएगा तो कभी मुहब्ब्त करने की गुस्ताखी न करता।यदि  शाहजहाँ को पता होता कि उसके मरने के तीन सौ साल बाद ताजमहल को शिव मंदिर या किसी राजा का महल आदि बताया जाएगा तो प्यार की निशानी के रूप में इतनी बङी इमारत बनाने के फेर में न पङता।वैसे ताजमहल बनाने में आज के आशिक की कोई दिलचस्पी नहीं(और हैसियत भी नहीं)और ऐसा भी नहीं कि जहाँ ताज नहीं बने,वहाँ प्यार नहीं था।ताजमहल मुगल कालीन कलाकारी का एक अद्भुत् नमूना है,पर प्यार की एकमात्र निशानी नहीं। आज का प्रेमी ताजमहल क्यों नहीं बना रहा?इसके कई कारण हो सकते हैं।एक तो यह कि अब बादशाह रहे नहीं और उनकी बची-कुची बादशाहत भी इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स बंद कर के खत्म कर दी।धीरे-धीरे समाजवाद मजबूत होता चला गया और बादशाह होना एक महंगा सौदा हो गया ।इससे अच्छा है गरीब होना और सब्सिडी का हकदार बनना।पर क्यों न सरकार ...

"शाजि़या" (लघुकथा)

'अभी तक वही रिंगटोन,इनफैक्ट इफ़ आई ऐम नॉट रॉंग फोन भी वो ही है ना? यू आर इम्पौसिबल किशन।सात साल में बिलकुल नहीं बदले' शाज़िया ही बोले जा रही है,किशन बस हाँ या ना में सर हिला देता है । सात साल पहले भी शाज़िया ही ज़्यादा बोलती थी, ब्राह्मण का ये छोरा तो अक्सर खामोश ही रहता था। बातों का सिलसिला आगे बढने लगता है। सात साल बाद जो मिल रहे हैं दोनों। 'तो मैडम कैसे हैं आपके शौहर?' 'अच्छे हैं,ही इज़ वैरी केयरिंग।' एंड किड्स? 'आई हैव ए सन ।शाहिद नाम है।पाँच साल का हो गया है।' 'तुम बताओ तुम्हारी लाईफ कैसी चल रही है? How is your wife?' 'पता है शालिनी को भी म्यूज़िक का शौक है,और कविताएं भी लिखती है और लप्रेक भी।' 'मतलब तुम्हारी ही तरह हैं? 'ऐक्चुअली तुम्हारी तरह भी है,मुझे बोलने का मौका ही नहीं देती।' 'और तुम्हारी डॉटर? 'Yeah she is also very cute. Infact she is also like you, दो साल की है।' 'क्या नाम है?' थोङी देर खामोश रहा किशन। यह खामोशी मानों सात सालों के मौन की कहानी कह रही थ...

"योगी" की जीत

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बीजेपी की यृपी में प्रचंड जीत के बाद से ही सोशल मीडिया के माध्यम से तो कहीं दीवारों पर पोस्टर चस्पा कर कुछ अफ़वाहों का दौर चलने लगा था जिसमें मुसलिम समाज में खौफ फैलाया जा रहा था और समाज में ज़हर फैलाया जा रहा था। अब योगी के सीएम बनने पर संभावित है कि समाज के कुछ उपद्रवी तत्व और अफवाहें फैलाने लगें।इन अफवाहों से बचे रहें और आपसी सौहार्द कायम रखें यह ज़िम्मेदारी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समाज दोनों की है। योगी आदित्यनाथ को कमान सौंपना यदि बीजेपी के फिर से भगवा राजनीति की ओर लौटने की ओर उठाया गया एक बङा कदम है तो बीजेपी की ऐतिहासिक जीत वर्षों से चली आ रही छद्म सेक्युलरवादिता से मोहभंग भी है।दरअसल परिणामों से और भगवा ओढने वाले के मुख्यमंत्री बनने से यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सेक्युलर विचारधारा खतरे में है या हिंदू ध्रुवीकरण बलशाली है,बल्कि यह छद्म सेक्युलरवादिता और सेक्युलर दिवालियापन के प्रति उदासीनता को दर्शाता है।वही छद्म सेक्युलरवाद जिसके हिसाब से भगवा पहनना सांप्रदायिक है पर मुस्लिम टोपी पहनना सेक्युलर,वही छद्म सेक्युलरवाद जिसको जलीकट्टू में क्रूरता तो नजर आती है पर...

In Solidarity with......

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This is the image of the now so-famous DU girl who has caught all attention,attracted tweets from all corners,for taking a stance that was diametrically opposite to the so-called nationalists. Well I'll not go on the Left vs Right Debate,I'll not comment on whether its the left that has gone far too anti-national in its intellects,or all this is the culmination of the state power that has gradually shifted to one side over the last couple of years, all I have to say is that perhaps we need to learn to respect views that are contradictory to ours,atleast in the universities,for if questions will not be asked in universities ,where will they be????? Last year when it all happened in JNU,I,like all nationalists,condemned the anti-national slogans.and NOT to mistake that all this while I have changed parties(of which I was never a part),anti-national slogans should always be condemned,without any ifs and buts. But the uproar that has followed this message in the placard,is in...

बायोपिक : सृजन के अभाव की उपज

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2016 अस्त की ओर है और 2017 उदय की। ये बङा वाजिब वक्त है Introspection का और चिंतन-मनन का जो कुछ अच्छा-बुरा 2016 में घटा।भीतर झांकने से पहले बाहर के विषयों पर चिंतन किया जाए।सो बात 2016 की बॉलीवुड फिल्मों की।हर साल की तरह इस साल भी सैंकड़ों फिल्में आईं।अब पसंद-नापसंद तो सभी की निजी राय होती है,किसी के "टेस्ट" को कुछ अपील करता है तो किसी को कुछ,फिर मैं कोई फिल्म ऐक्सपर्ट भी नहीं कि रिव्यू जैसा कुछ लिख सकूं।इसलिए बस एक बात जो प्रकट रूप में महसूस होती है -मेरी राय में बॉलीवुड में यह वर्ष "बायोपिक" का रहा।इस साल कई बङे नामचीन हस्तियों-घटनाओं-किरदारों आदि पर फिल्में बनीं।और अधिकतर कामयाब भी वही फिल्में रहीं।उदाहरण के लिए एम एस धोनी,नीरजा,सरबजीत ,रुस्तम,एयरलिफ्ट आदि-इत्यादि।वैसे ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की फिल्में इसी साल आईं हों इससे पहले भी सैकङों बायोपिक फिल्में आईं और अधिकतर कामयाब भी रहीं।पर इस साल तो जैसे ऐसी फिल्मों की बाढ ही आ गई।वैसे इन बायोपिक और सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्मों में कोई बुराई नहीं,इसलिए इस आलेख को किसी भी प्रकार से आलोचनात्मक न समझा जाए। परंतु ...

सुई या तलवार ?????

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि जहां काम आवै सुई, कहा करै तलवारि। रहीम का यह दोहा तो हमने सुना ही है,गौर करें बस सुई और तलवार पर। प्रत्येक वस्तु का अपना मूल्य है।जो काम सुईं से हो सकता है,वह तलवार से संभव नहीं।पर अफसोस कि आज हम एक ऐसे दौर में हैं जब सुईं की कला सीखने का नहीं,तलवार की ताकत तोलने का प्रचलन है।जब से सोशल नेटवर्किंग साइट्स आई हैं,हमने देखा हैकि अब चीज़ें लोकप्रिय नहीं होतीं,प्रसिद्ध नहीं होती,बस "वाइरल" होती हैं।और ये वाइरल ही बङा घातक है,विष के प्याले के समान है।फेसबुक-व्हॉट्स एप आदि के माध्यम से जो एक सबसे बङा विषकारक वाइरल फैल रहा है इन दिनों-वह है राष्ट्रवाद।राष्ट्रवाद हो तो अच्छा है,पर यह है फर्जी राश्ट्रवाद (इस शब्द के जनक इस दौर में डॉ कुमार विश्वास हैं जहॉँ तक मेरी जानकारी है)। बङा व्यापक और भयावह है यह फर्जी राष्ट्रवाद।और इस को खाद-पानी से सींचता है सोशल मीडिया का अभिशाप।आए दिन हमारा(मेरा तो नहीं) खून उबाल देने वाले पोस्ट और मैसेजेज़ देखने को मिलते हैं।जैसे एक तस्वीर में तिरंगे को जलाता एक लङका दिख रहा है,और उस पर "माता-बहनों के सम्मान सूचक...

"अनजानी राह"

एक पतली सी पगडंडी  पर पथिक चलता जा रहा है।पथिक क्या चलता है,बस राह ही चलती है।वह तो पथिक है,उसका काम ही है चलना।राह भी सीधी है,तो उसका चलना तो सहज ही है ।चलना भी आगे की ही ओर है,पीछे मुङना मुनासिब नहीं। इसलिए पथिक चल रहा है आगे,कोई व्याकुलता नहीं,कोई विह्वलता नहीं,बस गतिशीलता ही दिखाई पङती है। पर यह क्या? अचानक एक राह से दो राहें निकल पङीं। अब पथिक कुछ उलझन में है- किस ओर चले? दोनों ही राहें एक ही सी दिखती हैं- एक जैसा सन्नाटा है दोनों में,और ऐसा ही एक सन्नाटा पथिक के भीतर भी है- शून्यता का सन्नाटा। नहीं सूझता कहाँ जाए,कुछ पल सोचने लगा ही था कि उलझन और बढ गई-------कि अचानक तीसरी राह भी दिखने लगी।राह जिस पर चलकर पहुँचा था वह यहाँ तक,राह जिस पर उसकी सारी ऊर्जा का निचोङ था,राह जिसको वह अब छोङ आया था। अब माथे की नस दुखने लगी,इक मायूसी सी छाने लगी और गतिशीलता पथिक की अब समाप्त हो चुकी है ।थम चुके हैं पथिक के कदम और अंतत: एक  "पथिक" जीवन समाप्त हो गया- क्योंकि संभवत: एक अनजानी राह पर चलने का भय था उसके मन में,या संदेहों के,अनिश्चितताओं के,शंकाओं के काले बादलों में किरण का अभाव ...

"निष्काम कर्मयोगी"

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सावन का ये सोमवार इत्तेफाकों भरा रहा।हमने खोया तो पूरा दिन बहुत कुछ पर इंसानियत और असली धर्म का सबक भी याद दिला गया।पूरा दिन खुद को मुसलमान कहने वाले नापाक पाक आतंकियों ने फजीहत करे रखी सेना की,पुलिस की सरकार कीऔर आम जनों की जिनमें रहे होंगे करोङों हिंदू और करोङों मुसलमान भी,ईसाई भी,सिख भी और भी कई धर्मों को मानने वाले लोग सारा दिन आतंक में थे ।और शाम तक इन नापाक धर्म के दुश्मनों को मार गिराया गया।और ऑपरेशन सफल रहा।मगर शाम को मिला एक और शोक समाचार जो पूरे देश को गमगीन कर गया।नम हो गईं हर पलकें और हर मजहब के आँसू घुल रहे थे सावन की बूँदों में।हर कोई अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहता था इस महान विभूति को। मौत उन नापाकों की भी हुई थी और इस"मुसलमान" की भी। फर्क सिर्फ इतना था कि वो तीन फिदायीन आतंक और हथियारों के ताबूतों में रुखसत थे और इधर एक सच्चा मुसलमान देह त्याग रहा था और विदा ले रही थी वो दिव्य पुण्य आत्मा जिसके एक हाथ में गीता तो दूजे में कुरान थी ,आध्यात्म की नींवों में विज्ञान का कर्मयोग जारी था आखिरी श्वास तक............